[ad_1]

वाराणसी. क्या कभी आपने सुना है कि किसी दो मिनट की रामलीला (Ramlila) को देखने के लिए लाखों लोग घंटों इंतजार करते हों. शिवनगरी काशी में ऐसा ही होता है. हर साल आश्विन शुक्ल एकादशी की गोधुलि बेला में शाम 4.40 बजे ये दो मिनट की लीला होती है, जिसे देखने के लिए देशी विदेशी लाखों पर्यटक पहुंचते हैं. ये काशी के नाटी इमली (Nati Imli) की भरत मिलाप लीला है जो शनिवार को 478 बरस की हो गई.
इसके इतिहास पर नजर डालें तो लंका में दशानन का वध करने के बाद जब मर्यादा पुरुषोत्तम राम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ पहुंचते हैं तो भरत मिलाप मैदान में पहले से इंतजार कर रहे भाई भरत और शत्रुधन गले मिलते हैं. बामुश्किल ये दो मिनट की लीला होती है. इस मेले की गिनती दुनिया के सबसे पुराने मेलों में भी होती है. बताया जाता है कि लगभग पांच सौ साल पहले गोस्वामी तुलसीदास जी के शरीर त्यागने के बाद उनके समकालीन संत मेधा भगत काफी विचलित हो उठे.
यह है धार्मिक मान्यता
धार्मिक मान्यता है कि संत मेधा जगत एक रात सपने में पहले संत तुलसीदास ने दर्शन किए और कहा कि जाओ काशी के नाटी इमली में ये लीला करो. तुलसीदास की प्रेरणा से संत मेधा भगत ने ये लीला शुरू की. वहीं आयोजन समिति के महामंत्री मोहन कृष्ण अग्रवाल बताते हैं कि खुद भगवान राम ने भी मेधा भगत जी को सपना दिया था. लोगों का मानना है कि जिस वक्त चारों भाई गले मिलते हैं, साक्षात भगवान खुद धरती पर होते हैं. मान्यता तो यहां तक है कि तुलसीदास जी ने जब रामचरित मानस को काशी के घाटों पर लिखा उसके बाद खुद तुलसी दास जी ने भी स्थानीय कलाकारों के साथ ये लीला यहां शुरू की, लेकिन मान्यता की शक्ल मेघा भगत ने दी.
आयोजन से जुड़े विद्वानों का मानना ये भी है कि जिस चबूतरे पर चारों भाइयों का मिलन होता है. उसी चबूतरे पर मेघा भगत को भगवान राम ने दर्शन दिए. तभी से ये लीला काशी में अनवरत होती आ रही है. लीला को देखने के लिए काशी नरेश भी पूरे परिवार के साथ यहां पहुंचते हैं और सोने का नेग भी देते हैं. हालांकि इस साल काशी नरेश नहीं पहुंचे. यही नहीं वानर रूप में यादव बंधुओं के कंधे पर सवार होकर भगवान श्रीराम यहां पहुंचते हैं. पुष्पक विमान रूपी जिस रथ को यादव बंधु अपने कंधे पर उठाते हैं, उसका वजन इतना ज्यादा होता है कि वो आसान नहीं है. मान्यता है कि ये भगवान का आशीर्वाद ही है. इस मौके पर सिर पर साफा बांधे यादव बंधुओं की विशेष भेष भूषा भी आकर्षण का केंद्र रहती है. इन्हीं तमाम सारी मान्यताओं के कारण हर साल इस दो मिनट की इस लीला को देखने के लिए छतों, सड़कों, गलियों में लाखों लोग टकटकी लगाए देखते रहते हैं.
हर साल एक ही समय पर इसलिए होती है लीला
मान्यता है कि भरत ने प्रतिज्ञा उठाई थी कि ‘यदि आज मुझे सूर्यास्त के पहले भगवान श्रीराम के दर्शन नहीं हुए तो जीवन लीला समाप्त कर देंगे.’ इसीलिए यह लीला सूर्यास्त के पहले 4:40 पर होती है. ठीक 4 बजकर 40 मिनट पर जैसे ही अस्ताचलगामी सूर्य की किरणें भरत मिलाप मैदान के एक निश्चित स्थान पर पड़ती हैं तो भगवान राम और लक्ष्मण दौड़ कर भरत और शत्रुघ्न को गले लगाते हैं.पढ़ें Hindi News ऑनलाइन और देखें Live TV News18 हिंदी की वेबसाइट पर. जानिए देश-विदेश और अपने प्रदेश, बॉलीवुड, खेल जगत, बिज़नेस से जुड़ी News in Hindi.

[ad_2]

Source link